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हरीश रावत की एकला चलो राजनीति से उत्तराखंड कांग्रेस में हलचल….हाईकमान की हिदायत के बावजूद नहीं रुके हरीश रावत, ‘एकला चलो’ से कांग्रेस में बढ़ी हलचल

देहरादून। उत्तराखंड कांग्रेस में विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले अंदरूनी खींचतान एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कांग्रेस हाईकमान की आपत्ति के बावजूद अपनी ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ जारी रखकर संगठन के सामने नया राजनीतिक सवाल खड़ा कर दिया है। कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा की ओर से यात्रा को लेकर आपत्ति जताए जाने और इसे प्रदेश संगठन से समन्वय के बिना समानांतर कार्यक्रम न चलाने की सलाह दिए जाने के बावजूद रावत सोमवार को जसपुर से यात्रा पर निकल पड़े।

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की यात्रा सोमवार को जसपुर से शुरू होकर काशीपुर और रामनगर होते हुए हल्द्वानी की ओर बढ़ी। यात्रा में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं की मौजूदगी भी दिखाई दी। जसपुर में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह, विधायक आदेश चौहान समेत कई नेता रावत के साथ नजर आए। रामनगर में भी पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल सहित कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने उनका स्वागत किया।

सैलजा की आपत्ति, रावत का ‘अब रुकना नहीं’

यात्रा को लेकर कांग्रेस प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा ने रावत से आपत्ति जताई थी। पार्टी नेतृत्व की ओर से कहा गया कि विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और ऐसे समय में संगठन को एकजुट होकर सामूहिक रूप से आगे बढ़ने की जरूरत है। बिना प्रदेश कांग्रेस से चर्चा के अलग यात्रा निकालना पार्टी हित में नहीं माना गया। इसके जवाब में रावत ने यात्रा रोकने के बजाय सोशल मीडिया पर अपने तेवर स्पष्ट किए। उन्होंने कहा कि चुनौती बड़ी है, लेकिन उत्तराखंड के स्वाभिमान के लिए संकल्प भी दृढ़ है और यात्रा के इस दौर में अब रुकना नहीं है। उन्होंने जसपुर से हल्द्वानी तक लोगों से जुड़ने और संवाद करने का आह्वान किया। यानी पार्टी संगठन की ओर से जहां सामूहिक कार्यक्रम और समन्वय पर जोर दिया जा रहा है, वहीं रावत अपने कार्यक्रम को आगे बढ़ाने पर अड़े हैं। यही टकराव अब उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति में चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन गया है।

काशीपुर में रावत का सियासी संदेश

काशीपुर में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए रावत ने कहा कि जनता बदलाव चाहती है और कार्यकर्ताओं को जनता की भावनाओं को समझकर बदलाव की गति तेज करनी होगी। उन्होंने 2027 में देहरादून और 2029 में दिल्ली में बदलाव की बात भी कही। रावत ने अपनी यात्रा को लेकर सरकार पर भी राजनीतिक हमला बोला। हालांकि उनके कार्यक्रम में कांग्रेस के कुछ स्थानीय पदाधिकारियों की गैरमौजूदगी भी चर्चा का विषय बनी। काशीपुर में महानगर अध्यक्ष अलका पाल सहित जिला कांग्रेस कार्यकारिणी के कई प्रमुख पदाधिकारी कार्यक्रम में नजर नहीं आए। इससे यात्रा को लेकर कांग्रेस के भीतर

मतभेद की चर्चाओं को और बल मिला

‘बागी’ रावत या कांग्रेस के भीतर दबाव की राजनीति?
रावत के मौजूदा तेवरों को सीधे तौर पर कांग्रेस से बगावत कहना फिलहाल जल्दबाजी होगी। उन्होंने कांग्रेस छोड़ने की घोषणा नहीं की है। बल्कि उनकी ओर से लगातार यह संदेश दिया जा रहा है कि यात्रा का मकसद जनता से संवाद करना और कांग्रेस को मजबूत करना है। लेकिन राजनीतिक तौर पर सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि रावत ने पार्टी नेतृत्व की स्पष्ट आपत्ति के बाद भी अपना कार्यक्रम जारी रखा है। यही स्थिति उनके कदम को कांग्रेस संगठन के लिए असहज बना रही है। राजनीतिक विश्लेषण में इसे एक ओर जहां रावत की स्वतंत्र राजनीतिक सक्रियता के तौर पर देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर पार्टी के भीतर अपनी राजनीतिक भूमिका और प्रभाव को बनाए रखने की कोशिश के रूप में भी इसकी व्याख्या हो रही है।

पदों से इस्तीफे की पेशकश के बाद बढ़ी थी हलचल

रावत की मौजूदा यात्रा को उनके हालिया संगठनात्मक घटनाक्रम से अलग करके भी नहीं देखा जा सकता। सितंबर में उन्होंने कांग्रेस की प्रदेश कार्यकारिणी और कांग्रेस कार्यसमिति के स्थायी आमंत्रित सदस्य के पद से इस्तीफे की पेशकश की थी। इस घटनाक्रम ने भी प्रदेश कांग्रेस के भीतर राजनीतिक हलचल बढ़ाई थी।
हालांकि पदों से हटने की पेशकश और कांग्रेस से अलग होने के बीच फर्क है। रावत ने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता छोड़ने की घोषणा नहीं की थी। इसलिए मौजूदा स्थिति को पार्टी से उनके अलगाव के बजाय संगठन के भीतर बढ़ते मतभेदों और राजनीतिक असहमति के संदर्भ में देखना अधिक सटीक होगा।

रावत को दिल्ली तलब किए जाने की भी चर्चा

यात्रा को लेकर बढ़े विवाद के बीच कांग्रेस हाईकमान की ओर से रावत को दिल्ली बुलाए जाने की खबर भी सामने आई है। रिपोर्टों के मुताबिक उनके राजनीतिक कार्यक्रमों और संगठन के साथ समन्वय को लेकर बातचीत हो सकती है। कांग्रेस की ओर से यात्रा को लेकर रावत का पक्ष सुनने के बाद आगे का निर्णय लिए जाने की बात भी सामने आई है।

2027 से पहले बड़ा सवाल—कांग्रेस चलेगी साथ या अलग-अलग राहों पर…?

उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच रावत की जनसंवाद यात्रा कांग्रेस के लिए केवल एक यात्रा नहीं रह गई है। यह अब संगठनात्मक अनुशासन, वरिष्ठ नेतृत्व की भूमिका और पार्टी के भीतर राजनीतिक तालमेल का सवाल बन चुकी है। हरीश रावत लंबे समय से उत्तराखंड कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में रहे हैं। ऐसे में उनका जनता और कार्यकर्ताओं के बीच सीधे उतरना पार्टी के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर, हाईकमान की प्राथमिकता चुनाव से पहले संगठन को एकजुट रखने की है। यही वजह है कि आने वाले दिनों में सबसे बड़ा सवाल यह रहेगा कि क्या रावत की यात्रा को कांग्रेस संगठन के आधिकारिक कार्यक्रम से जोड़ा जाता है, क्या दोनों पक्षों के बीच समझौता होता है या फिर यह टकराव और गहराता है।
फिलहाल तस्वीर इतनी साफ है कि रावत ने हाईकमान की आपत्ति के बावजूद यात्रा नहीं रोकी है और कांग्रेस नेतृत्व भी इस मुद्दे को नजरअंदाज करने के मूड में नहीं दिख रहा। ऐसे में उत्तराखंड कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में आने वाले दिन खासे महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।

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