भेरू कू तमाशु में गूंजा ढोल-दमाऊं, देव डोलियों के साथ भेड़ों ने की परिक्रमा
देहरादून। लोक आस्था, पौराणिक मान्यताओं और पहाड़ की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं का प्रतीक माने जाने वाला त्रिवार्षिक ‘भेरू कू तमाशु’ यानी भेड़ परिक्रमा मेला इस बार उत्तरकाशी के ठाण्डी और टिहरी के निवाल गांव में श्रद्धा और उल्लास के साथ आयोजित हुआ। तीन दिन तक चले इस पारंपरिक मेले में भारी बारिश के बावजूद बड़ी संख्या में ग्रामीणों और श्रद्धालुओं ने पहुंचकर देव डोलियों के दर्शन किए और सदियों पुरानी परंपरा के साक्षी बने।

देव डोलियों के दर्शन को उमड़े श्रद्धालु
मेले में विभिन्न देव डोलियों की पूजा-अर्चना के लिए ग्रामीणों की भीड़ उमड़ी। देव डोलियों के प्रति स्थानीय लोगों की गहरी आस्था और विश्वास ने आयोजन को और विशेष बना दिया। धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान देवता के अवतरित होने और आशीर्वाद प्राप्त करने की परंपरा ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। ढोल-दमाऊं की गूंज और पारंपरिक रीति-रिवाजों के बीच पूरा क्षेत्र लोक संस्कृति के रंग में रंगा नजर आया।
बारिश भी नहीं डिगा पाई श्रद्धालुओं का उत्साह
मेले के दौरान मौसम खराब रहने और लगातार बारिश के बावजूद लोगों के उत्साह में कोई कमी नहीं आई। दूर-दराज के गांवों से लोग आयोजन में पहुंचे। स्थानीय लोगों का कहना है कि भेरू कू तमाशु केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह पशुपालक जीवन, प्रकृति, कृषि, लोकविश्वास और सामुदायिक एकजुटता से जुड़ी सदियों पुरानी परंपरा है, जो आज भी पहाड़ के ग्रामीण जीवन में पूरी आस्था के साथ जीवित है।
नई पीढ़ी को जड़ों से जोड़ता है आयोजन
बदलते दौर में इस तरह के पारंपरिक आयोजन पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। भेरू कू तमाशु नई पीढ़ी को अपनी लोक परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का माध्यम भी बन रहा है। स्थानीय लोगों ने कहा कि इस तरह के आयोजनों को भविष्य में और व्यापक स्वरूप देकर युवा पीढ़ी को इससे जोड़ने की जरूरत है। ठाण्डी और निवाल गांव की आयोजन समितियों ने मेले के सफल आयोजन के लिए ग्रामीणों, श्रद्धालुओं, पशुपालकों और सहयोग करने वाले सभी लोगों का आभार जताया। आयोजन के समापन पर क्षेत्र की सुख-समृद्धि, पशुधन की सुरक्षा और अच्छी फसल की कामना की गई।
भेरू कू तमाशु ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि पहाड़ की संस्कृति केवल परंपराओं की स्मृति नहीं, बल्कि आज भी गांवों के लोकजीवन और आस्था में पूरी जीवंतता के साथ सांस ले रही है।
