जनक दरबार में गूंजी पुरानी पेंशन की मांग, अब मुख्यमंत्री आवास घेराव की तैयारी
सीताराम पोखरियाल ने महाराज जनक के समक्ष रखी कार्मिकों की फरियाद, 2 नवंबर को देहरादून में जुटेंगे कर्मचारी; मांग नहीं मानी तो भूख हड़ताल की चेतावनी

देहरादून। पुरानी पेंशन बहाली की मांग को लेकर उत्तराखंड में कार्मिकों का आंदोलन एक बार फिर तेज होने जा रहा है। राष्ट्रीय पुरानी पेंशन बहाली संयुक्त मोर्चा (NOPRUF) ने अब सीधे मुख्यमंत्री आवास के घेराव का ऐलान किया है। संगठन के प्रदेश महासचिव सीताराम पोखरियाल ने 2 नवंबर 2026 को प्रस्तावित घेराव में प्रदेशभर के शिक्षक-कर्मचारियों और अधिकारियों से शामिल होने की अपील की है। चेतावनी दी गई है कि इसके बाद भी सरकार ने मांग पर ठोस निर्णय नहीं लिया तो आंदोलन के अगले चरण में भूख हड़ताल शुरू की जाएगी।
पुरानी पेंशन बहाली की मांग को लेकर कर्मचारियों का संघर्ष अब केवल ज्ञापन देने और धरना-प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहना चाहता। जनजागरण अभियानों, रैलियों और घेराव जैसे कार्यक्रमों के बावजूद मांग पूरी नहीं होने से संगठन में नाराजगी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर कर्मचारियों को अपनी सामाजिक सुरक्षा की मांग मनवाने के लिए और कितने आंदोलन करने पड़ेंगे?
जनक दरबार में उठाई कर्मचारियों के भविष्य की चिंता
सीता स्वयंवर के अवसर पर आयोजित जनक दरबार में कर्मचारी नेता सीताराम पोखरियाल ने पुरानी पेंशन बहाली का मुद्दा उठाते हुए महाराज जनक के समक्ष कार्मिकों की फरियाद रखी। उन्होंने कहा कि कर्मचारी अपने जीवन के बहुमूल्य वर्ष देश और प्रदेश की सेवा में लगा देते हैं। ऐसे में सेवानिवृत्ति के बाद सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन की अपेक्षा करना उनका अधिकार है। पोखरियाल ने भावपूर्ण अंदाज में कहा कि कर्मचारी सरकार से कोई खैरात नहीं मांग रहे, बल्कि जीवनभर की सेवा के बाद बुढ़ापे की सामाजिक सुरक्षा चाहते हैं। जनक दरबार को न्याय और मर्यादा का प्रतीक बताते हुए उन्होंने उम्मीद जताई कि कार्मिकों की मांग को भी न्याय की दृष्टि से देखा जाएगा।
कई आंदोलन, कई ज्ञापन, फिर भी इंतजार
NOPRUF के मुताबिक, संगठन पिछले कई वर्षों से पुरानी पेंशन बहाली की मांग को लेकर आंदोलन कर रहा है। वर्ष 2026 में भी देहरादून से लेकर पहाड़ के विभिन्न जनपदों तक रैलियां, धरना-प्रदर्शन, जनजागरण यात्राएं और ज्ञापन कार्यक्रम आयोजित किए गए। 12 अप्रैल को देहरादून में बाइक रैली निकाली गई। 1 मई को पौड़ी में आयुक्त कार्यालय घेराव, 24 मई को कर्णप्रयाग में रैली और 12 जून को अल्मोड़ा में गोल्ज्यू देवता यात्रा के साथ OPS जनजागरण पदयात्रा आयोजित की गई। इसके बाद 22 जून को सचिवालय घेराव, 12 जुलाई को ‘OPS के लिए एक पौधा’ अभियान और 4 अगस्त को प्रदेशस्तरीय बैठक हुई। सितंबर में भी आंदोलन की गतिविधियां जारी रहीं। 7 से 19 सितंबर तक कार्मिकों ने काली पट्टी बांधकर जनजागरण किया और विभागवार गेट मीटिंग आयोजित कीं। 21 से 24 सितंबर तक मंत्रियों को ज्ञापन सौंपने का अभियान चलाया गया। 25 सितंबर को जिला एवं तहसील स्तर पर धरना-प्रदर्शन और 1 अक्टूबर को रुद्रप्रयाग में कार्यक्रम आयोजित किया गया। बता दें कि कर्मचारियों की मांग पुरानी है, आंदोलन लगातार जारी है और ज्ञापनों की फाइल भी लंबी होती जा रही है, लेकिन संगठन को अब तक अपनी मांग पर ठोस निर्णय का इंतजार है। कर्मचारियों का सवाल है कि जब वे लोकतांत्रिक तरीके से बार-बार अपनी बात सरकार तक पहुंचा रहे हैं, तो उनकी सामाजिक सुरक्षा से जुड़े इस मुद्दे का समाधान आखिर कब निकलेगा?
सरकार पर बढ़ेगा दबाव, 13 जिलों में प्रचार अभियान
मुख्यमंत्री आवास घेराव को सफल बनाने के लिए संगठन ने प्रदेश के सभी 13 जनपदों में प्रचार-प्रसार और जनजागरण अभियान शुरू किया है। पदाधिकारी और कार्यकर्ता विभिन्न विभागों तथा कार्यालयों में पहुंचकर कार्मिकों को आंदोलन से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। प्रदेश महासचिव सीताराम पोखरियाल ने शिक्षक, कर्मचारी और अधिकारियों से व्यक्तिगत मतभेदों से ऊपर उठकर एकजुट होने की अपील की है। उनका कहना है कि पुरानी पेंशन का मुद्दा केवल वर्तमान कर्मचारियों का नहीं, बल्कि उनके परिवारों और सेवानिवृत्ति के बाद के जीवन की आर्थिक सुरक्षा से भी जुड़ा है।
2 नवंबर को घेराव, फिर भूख हड़ताल की तैयारी
NOPRUF ने स्पष्ट किया है कि 2 नवंबर 2026 को मुख्यमंत्री आवास घेराव के जरिए सरकार के समक्ष पुरानी पेंशन बहाली की मांग मजबूती से रखी जाएगी। यदि इसके बाद भी कोई ठोस निर्णय नहीं होता है, तो संगठन भूख हड़ताल का रास्ता अपना सकता है। अब निगाहें 2 नवंबर के प्रस्तावित आंदोलन पर टिकी हैं। एक ओर कर्मचारी अपनी सेवानिवृत्ति के बाद की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं, तो दूसरी ओर सरकार के सामने इस मांग को लेकर बढ़ते दबाव का सवाल है। फिलहाल कर्मचारियों की फरियाद जनक दरबार से लेकर मुख्यमंत्री आवास तक पहुंचाने की तैयारी है। देखना यह होगा कि आंदोलन की यह आवाज किसी ठोस फैसले तक पहुंचती है या पुरानी पेंशन की बहाली का मुद्दा एक बार फिर आश्वासनों और प्रदर्शनों के बीच उलझा रहता है।