आरटीआई के दबाव में जागा एएसआई, टिहरी के दूरस्थ गांव में मिले 94 हथियारों की हुई वैज्ञानिक जांच

देहरादून। टिहरी गढ़वाल के दूरस्थ क्षेत्र पेपोला ढुंग में वर्ष 2015 में सड़क निर्माण के दौरान जमीन से मिले प्राचीन हथियारों की आखिरकार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने वैज्ञानिक जांच पूरी कर ली है। करीब एक दशक तक स्टोर में पड़े रहे इन हथियारों की जांच RTI कार्यकर्ता की लगातार पहल और सूचना के अधिकार (RTI) के दबाव के बाद संभव हो सकी।
जानकारी के अनुसार, वर्ष 2015 में टिहरी गढ़वाल के पेपोला ढुंग क्षेत्र में सड़क निर्माण कार्य के दौरान जमीन से तलवारें, भाले और अन्य हथियार बरामद हुए थे। कुल 94 हथियारों को ASI ने अपने कब्जे में लेकर देहरादून कार्यालय के स्टोर में सुरक्षित रखा था, लेकिन इनकी वैज्ञानिक जांच नहीं कराई गई थी। देहरादून निवासी RTI कार्यकर्ता राजू गुसाईं ने 17 फरवरी 2025 को ASI में सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन दाखिल कर इन हथियारों की स्थिति और जांच के बारे में जानकारी मांगी। ASI की ओर से मिले जवाब में खुलासा हुआ कि बरामद हथियारों की अब तक कोई वैज्ञानिक जांच नहीं हुई है। इसके बाद राजू गुसाईं ने लगातार RTI आवेदन दाखिल कर विभाग पर दबाव बनाए रखा। बताया गया कि RTI के दबाव के बाद ASI ने हथियारों को वैज्ञानिक परीक्षण के लिए भेजा। ASI की “वैज्ञानिक एवं संरक्षण शाखा” द्वारा 8 और 9 मई 2025 को जांच की गई तथा 26 मई 2025 को प्रारंभिक रिपोर्ट तैयार की गई। जांच में ‘हैंडहेल्ड XRF (X-Ray Fluorescence) Alloy Analyzer’ तकनीक का इस्तेमाल किया गया। कुल 94 में से 80 हथियारों की वैज्ञानिक जांच की गई। ASI की रिपोर्ट में एक तलवार को लेकर विशेष टिप्पणी की गई है। रिपोर्ट के अनुसार तलवार में तांबे और जस्ता (जिंक) से समृद्ध एक भाग मिला है, जो संभवतः “क्विलॉन ब्लॉक” या “क्रॉस गार्ड” हो सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इससे संकेत मिलता है कि हथियार निर्माण में कुछ हिस्सों में जानबूझकर पीतल का उपयोग किया गया था, जबकि अन्य हिस्से मुख्य रूप से लोहे के बने थे। यह उस समय हथियार निर्माण में धातुओं के चयन और तकनीकी समझ को दर्शाता है। RTI कार्यकर्ता राजू गुसाईं ने कहा कि यदि लगातार सूचना के अधिकार के तहत जानकारी नहीं मांगी जाती, तो यह महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सामग्री यूं ही वर्षों तक स्टोर में पड़ी रहती। उन्होंने कहा कि अब जरूरत है कि इन हथियारों के ऐतिहासिक महत्व और काल निर्धारण पर विस्तृत शोध कराया जाए, ताकि उत्तराखंड के इतिहास से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकें।
