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दयारा बुग्याल में गूंजी लोक संस्कृति की अनूठी रंगत, दूध-मक्खन और मट्ठे से खेली होली

देहरादून। उत्तराखंड की समृद्ध लोक परंपराओं, पौराणिक मान्यताओं और प्रकृति से जुड़ी संस्कृति की झलक एक बार फिर उत्तरकाशी जिले के दयारा बुग्याल में देखने को मिली। यहां दयारा बुग्याल में सोमवार को सदियों पुरानी लोक परंपरा अढूंडी यानी बटर फेस्टिवल पूरे उत्साह और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया गया। करीब 11 हजार फीट की ऊंचाई पर आयोजित इस अनूठे पर्व में स्थानीय ग्रामीणों के साथ देश-दुनिया से पहुंचे पर्यटकों ने भी भाग लिया। इस दौरान दूध, मक्खन और मट्ठे से होली खेली गई, वहीं भगवान श्रीकृष्ण और राधा के मनमोहक नृत्य ने आयोजन को विशेष आकर्षण प्रदान किया। जबकि देव डोलियों और देव पशुवा ने लोगों क़ो आशीर्वाद दिया। पर्व क़ो लेकर इस बार भी समिति क़ो मुख्यमंत्री के आने की उम्मीदें थी, लेकिन खराब मौसम के चलते मुख्यमंत्री का कार्यक्रम नहीं बना। हालाँकि मुख्यमंत्री के गढ़वाल समन्वयक किशोर भट्ट ने कार्यक्रम में पहुंचकर समिति और ग्रामीणों क़ो भरोसा दिलाया कि वह दयारा बुग्याल के विकास क़ो रफ्तार देने क़ो लेकर वह मुख्यमंत्री से अनुरोध करेंगे। साथ ही दयारा में नेचर टूरिज्म और बर्फ वाले सीजन में स्कीइंग जैसी गतिविधियों क़ो बढ़ाया देंगे। दयारा विकास पर्यटन समिति के अध्यक्ष मनोज राणा ने कहा कि पौराणिक मान्यताओं, पशुपालन और प्रकृति के प्रति आभार की भावना से जुड़ा यह उत्सव उत्तराखंड के लोकपर्वों में अपनी अलग पहचान रखता है। यही वजह है कि दयारा बुग्याल का बटर फेस्टिवल अब स्थानीय परंपरा से आगे बढ़कर देश-विदेश के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन चुका है। इस मौके पर जिला पर्यटन अधिकारी कुशाल सिंह नेगी, भाजपा मंडल अध्यक्ष मनोज रावत, युवा पर्यटन व्यवसायी पृथ्वी सिंह राणा, समेत अन्य मौजूद रहे।

11 हजार फीट की ऊंचाई पर अनूठा उत्सव

उत्तरकाशी जिले के रैथल गांव से करीब सात किलोमीटर की पैदल दूरी पर स्थित दयारा बुग्याल लगभग 28 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। करीब 11 हजार फीट की ऊंचाई पर फैले इस विशाल बुग्याल में हर वर्ष भाद्रपद माह की संक्रांति के अगले दिन अढूंडी उत्सव का आयोजन किया जाता है। मखमली घास से ढके विशाल मैदान, चारों ओर फैली हिमालय की चोटियां और प्राकृतिक सौंदर्य इस पर्व की भव्यता को और बढ़ा देते हैं।
पहले इस पर्व को स्थानीय स्तर पर अढूंडी उत्सव के नाम से जाना जाता था, लेकिन दूध, मक्खन और मट्ठे से खेली जाने वाली अनोखी होली के कारण पिछले करीब दो दशकों में इसे बटर फेस्टिवल के नाम से देशभर में पहचान मिली है।

दूध-मक्खन और मट्ठे की होली बनी आकर्षण

बटर फेस्टिवल के दौरान ग्रामीणों और पर्यटकों ने एक-दूसरे पर दूध, मक्खन और मट्ठा डालकर जमकर होली खेली। पारंपरिक लोकगीतों और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के बीच पूरा दयारा बुग्याल लोक संस्कृति के रंग में रंगा नजर आया। श्रीकृष्ण और राधा के रूप में कलाकारों की प्रस्तुति और नृत्य ने भी लोगों का ध्यान आकर्षित किया। स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना कर क्षेत्र की सुख-समृद्धि, खुशहाली और पशुधन की रक्षा की कामना की गई। ग्रामीणों ने प्रकृति और बुग्यालों के संरक्षण का संकल्प भी लिया।

पशुपालन और प्रकृति के प्रति आभार का पर्व

बटर फेस्टिवल केवल मनोरंजन या सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन, पशुपालन और प्रकृति के बीच सदियों से चले आ रहे रिश्ते का प्रतीक है। गर्मियों की शुरुआत के साथ रैथल सहित आसपास के गांवों के ग्रामीण अपने मवेशियों के साथ दयारा बुग्याल की छानियों में पहुंचते हैं। यहां मवेशियों के लिए विशाल प्राकृतिक चारागाह उपलब्ध होते हैं। बुग्याल में उगने वाली विभिन्न औषधीय वनस्पतियों और पौष्टिक घास को पशुओं के लिए बेहद उपयोगी माना जाता है। इससे दुधारू पशुओं के स्वास्थ्य और दुग्ध उत्पादन में भी वृद्धि होती है। मानसून के बाद जब बुग्याल में ठंड बढ़ने लगती है और ग्रामीणों की गांव लौटने की तैयारी शुरू होती है, उससे पहले प्रकृति, स्थानीय देवी-देवताओं और भगवान श्रीकृष्ण के प्रति आभार व्यक्त करने की परंपरा निभाई जाती है। इसी परंपरा का सबसे जीवंत रूप अढूंडी उत्सव है।

पांच गांवों ने मिलकर बढ़ाई आयोजन की भव्यता

इस वर्ष बटर फेस्टिवल की खास बात यह रही कि आयोजन में रैथल के साथ आसपास के गांवों की भी सक्रिय भागीदारी रही। रैथल, नटीण, बंद्राणी, क्यार्क और भटवाड़ी गांवों के ग्रामीणों ने संयुक्त रूप से आयोजन में हिस्सा लिया। पारंपरिक रूप से पंचगाईं क्षेत्र के रूप में पहचाने जाने वाले इन गांवों के शामिल होने से इस बार उत्सव का स्वरूप और व्यापक हो गया। दयारा पर्यटन उत्सव समिति के बैनर तले पिछले करीब दो दशक से इस पर्व को आयोजित किया जा रहा है। समिति के अध्यक्ष मनोज राणा ने कहा कि अढूंडी यानी बटर फेस्टिवल प्रकृति, पशुपालन और लोक आस्था के प्रति ग्रामीणों की कृतज्ञता का अनूठा प्रतीक है। उन्होंने कहा कि इस पर्व के माध्यम से ग्रामीण भगवान श्रीकृष्ण से पशुधन की समृद्धि और क्षेत्र की खुशहाली की कामना करते हैं।


बारिश बनी उत्सव के उल्लास में बाधा

बटर फेस्टिवल में इस बार मौसम ने जरूर खलल डाला। दयारा बुग्याल क्षेत्र में बारिश के कारण पर्यटकों को हिमालय की चोटियों और बुग्याल के प्राकृतिक सौंदर्य का अपेक्षित नजारा नहीं मिल पाया। खराब मौसम के चलते आयोजन भी अपेक्षाकृत सादगी से किया गया। हालांकि, मौसम में थोड़ी राहत मिलते ही ग्रामीणों और पर्यटकों ने दूध, मक्खन और मट्ठे की होली खेलकर उत्सव का भरपूर आनंद लिया। बारिश के बावजूद बड़ी संख्या में लोग इस अनूठे पर्व का हिस्सा बनने पहुंचे। पर्यटकों के लिए दयारा बुग्याल की यात्रा केवल प्राकृतिक सौंदर्य देखने तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्हें उत्तराखंड की सदियों पुरानी लोक संस्कृति और पशुपालन आधारित जीवनशैली को करीब से समझने का अवसर भी मिला।

पर्यटन को नई पहचान दे रहा बटर फेस्टिवल

दयारा बुग्याल का बटर फेस्टिवल अब उत्तरकाशी के पर्यटन कैलेंडर में महत्वपूर्ण स्थान बना चुका है। स्थानीय ग्रामीणों का मानना है कि इस तरह के पारंपरिक आयोजनों से नई पीढ़ी अपनी जड़ों और लोक संस्कृति से जुड़ती है। वहीं, देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के लिए यह पर्व उत्तराखंड की उस संस्कृति को समझने का माध्यम बन रहा है, जिसमें प्रकृति केवल संसाधन नहीं बल्कि जीवन का अभिन्न हिस्सा मानी जाती है। ग्रामीणों के अनुसार दयारा बुग्याल के संरक्षण के बिना इस परंपरा का भविष्य संभव नहीं है। इसलिए इस वर्ष उत्सव के दौरान पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया गया। प्लास्टिक और कचरे से बुग्याल को बचाने तथा इसकी प्राकृतिक सुंदरता को बनाए रखने का संकल्प लिया गया।

सदियों पुरानी परंपरा, आधुनिक दौर में नई पहचान

दयारा का अढूंडी पर्व इस बात का उदाहरण है कि उत्तराखंड की लोक परंपराएं आज भी प्रकृति, पशुधन, आस्था और सामुदायिक जीवन को एक सूत्र में बांधे हुए हैं। दूध-मक्खन की होली, राधा-कृष्ण की झांकी और लोक संस्कृति की रंगत के बीच मनाया जाने वाला यह पर्व न केवल ग्रामीणों की आस्था को मजबूत करता है, बल्कि उत्तराखंड के बुग्यालों और पारंपरिक पर्यटन को भी नई पहचान दे रहा है।

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