‘स्प्रिंगशेड मैनेजमेंट एंड क्लाइमेट एडॉप्टेशन’ में विशेषज्ञों ने साझा किए सुझाव, कम पानी में अधिक उत्पादन वाली फसलों को बढ़ावा देने पर भी चर्चा

देहरादून। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में लगातार कमजोर हो रहे जलस्रोतों और बढ़ती पेयजल समस्या के बीच जलस्रोतों के संरक्षण को लेकर एक दिवसीय जिला स्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। सेंट्रल हिमालयन एक्शन ग्रुप (चिराग) की ओर से ‘स्प्रिंगशेड मैनेजमेंट एंड क्लाइमेट एडॉप्टेशन’ विषय पर आयोजित कार्यशाला में नौला-धारों के संरक्षण, जलस्रोतों के पुनर्जीवन तथा बदलती जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप जल प्रबंधन पर विस्तार से चर्चा हुई।
नैनीताल के लेमन ट्री होटल, मोती रामनगर में आयोजित कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य जलस्रोतों के क्षरण को रोकना और इनके संरक्षण के लिए विभिन्न विभागों एवं गैर-सरकारी संगठनों के बीच समन्वय को मजबूत करना रहा। कार्यशाला में वक्ताओं ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक जलस्रोतों के कमजोर होने से पेयजल की समस्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में पारंपरिक जलस्रोतों को संरक्षित करने के साथ ही उनके कैचमेंट क्षेत्रों पर भी विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
उत्तराखंड में नौला-धारों का संरक्षण जरूरी
कार्यशाला का शुभारंभ करते हुए चिराग संस्था के अधिशासी निदेशक बद्रीश मेहरा ने कहा कि उत्तराखंड के पारंपरिक नौला-धारे केवल पेयजल के स्रोत नहीं हैं, बल्कि पर्वतीय जीवन और स्थानीय पारिस्थितिकी का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनके संरक्षण के लिए सरकारी विभागों, गैर-सरकारी संस्थाओं और स्थानीय समुदायों को मिलकर काम करना होगा। उन्होंने कहा कि जलस्रोतों के संरक्षण के लिए केवल स्रोत स्थल पर काम करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके आसपास के जलागम क्षेत्रों में भी संरक्षण एवं जल संचयन से जुड़े उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करना आवश्यक है।
विभिन्न विभागों और संस्थाओं की भागीदारी
कार्यशाला में चिराग संस्था की वरिष्ठ टीम के साथ सुरेंद्र सिंह नेगी, अभिषेक लिंकस, लीडर टेक्निकल ग्रुप भूपाल बिष्ट, एसडीओ कामिनी आर्या, बीडीओ गिरीश पांडे, नैनीताल से सौरभ कफप्याल, कैबिनेट फाउंडेशन के एच.एस. बघाली सहित विभिन्न विभागों एवं संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने सहभागिता की। इस दौरान प्रतिभागियों ने जलस्रोतों के संरक्षण, जल उपलब्धता बढ़ाने और ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की समस्या के स्थायी समाधान को लेकर अपने सुझाव रखे। कार्यशाला में विभिन्न विभागों के बीच समन्वित प्रयासों की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।
कम पानी में अधिक उत्पादन पर दिया जोर
कार्यशाला में कृषि क्षेत्र को जल संरक्षण से जोड़ने पर भी विशेष चर्चा हुई। कृषि विभाग की ओर से बताया गया कि कम पानी की आवश्यकता वाली फसलों को प्रोत्साहित कर जल संकट वाले क्षेत्रों में भी कृषि उत्पादन और किसानों की आय को बढ़ाया जा सकता है। विशेष रूप से मंडुआ, झंगोरा, रामदाना और काकुना जैसे मोटे अनाजों को अपनाने पर जोर दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि श्री अन्न योजना के माध्यम से भी मोटे अनाजों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इनके अलावा दलहनी फसलों और एग्रोफोरेस्ट्री आधारित खेती को अपनाकर कम पानी वाले क्षेत्रों में भी बेहतर उत्पादन और आय अर्जित की जा सकती है।
कार्यशाला में यह संदेश भी सामने आया कि जल संरक्षण और कृषि प्रबंधन को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जोड़कर आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। इससे एक ओर प्राकृतिक जलस्रोतों पर दबाव कम किया जा सकता है, वहीं दूसरी ओर पर्वतीय क्षेत्रों में किसानों के लिए कम पानी में टिकाऊ कृषि के विकल्प विकसित किए जा सकते हैं।
जलस्रोत बचाने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी
विशेषज्ञों और प्रतिभागियों ने कहा कि जलस्रोतों का संरक्षण केवल किसी एक विभाग या संस्था की जिम्मेदारी नहीं है। इसके लिए स्थानीय समुदाय, सरकारी विभाग, गैर-सरकारी संगठन और तकनीकी विशेषज्ञों को मिलकर दीर्घकालिक रणनीति के साथ काम करना होगा। कार्यशाला में जलस्रोतों के संरक्षण के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए स्थानीय स्तर पर अनुकूलन की योजनाएं तैयार करने पर भी जोर दिया गया।
