उत्तराखंड में 14 साल पुरानी PCS वरिष्ठता विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर, प्रमोटी अधिकारियों को बड़ी राहत

देहरादून। उत्तराखंड के प्रमोटी पीसीएस अधिकारियों और डायरेक्ट भर्ती पीसीएस अधिकारियों के बीच पिछले लगभग 14 वर्षों से चल रहे वरिष्ठता विवाद का अंत हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार तथा डायरेक्ट भर्ती अधिकारियों की अपीलों को खारिज करते हुए प्रमोटी पीसीएस अधिकारियों के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायालय ने आदेश दिया है कि पात्र प्रमोटी अधिकारियों को 1 अक्टूबर 2007 से नियमित नियुक्ति एवं वरिष्ठता का लाभ दिया जाए तथा राज्य सरकार तीन माह के भीतर संशोधित वरिष्ठता सूची जारी करे।
यह मामला जगदीश चंद्र कांडपाल बनाम उत्तराखंड राज्य सरकार के नाम से लंबे समय से न्यायालयों में विचाराधीन था। सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय से राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था, वरिष्ठता निर्धारण, पदोन्नतियों और भविष्य की नियुक्तियों पर व्यापक प्रभाव पड़ने की संभावना है।
IAS पदोन्नति की राह होगी आसान
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सबसे बड़ा लाभ वरिष्ठ प्रमोटी पीसीएस अधिकारियों को मिलने जा रहा है। इनमें जगदीश चंद्र कांडपाल, हरवीर सिंह, उत्तम सिंह चौहान और चंद्र सिंह मातोलिया जैसे अधिकारी प्रमुख हैं। संशोधित वरिष्ठता सूची लागू होने के बाद इन अधिकारियों की स्थिति आईएएस पदोन्नति की दौड़ में पहले से अधिक मजबूत मानी जा रही है। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, पूर्व एवं आगामी वर्षों की रिक्तियों के आधार पर इन अधिकारियों को आईएएस पदोन्नति का लाभ मिलने की संभावना बढ़ गई है।
अन्य अधिकारियों को भी मिलेगा लाभ
फैसले का प्रभाव केवल आईएएस पदोन्नति तक सीमित नहीं रहेगा। वरिष्ठता में बदलाव होने के बाद कई ऐसे प्रमोटी पीसीएस अधिकारी, जो अभी तक विभिन्न सेवा लाभों से वंचित थे, उन्हें भी 10 हजार ग्रेड पे, वरिष्ठता, पदोन्नति तथा अन्य सेवा लाभ प्राप्त हो सकते हैं। आने वाले समय में गिरीश गुणवंत, त्रिलोक सिंह, प्रकाश सिंह दुमका, सुंदर लाल सेमवाल सहित अन्य कई प्रमोटी अधिकारियों को भी इस निर्णय का लाभ मिलने की संभावना जताई जा रही है।
2012 से चल रहा था विवाद
यह वरिष्ठता विवाद वर्ष 2012 से न्यायालय में लंबित था। वर्ष 2013 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने प्रमोटी अधिकारियों के पक्ष में निर्णय दिया था। इसके बाद तत्कालीन राज्य सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। करीब 14 वर्ष तक चली कानूनी लड़ाई के बाद अब सर्वोच्च न्यायालय ने हाईकोर्ट के निर्णय को बरकरार रखते हुए प्रमोटी अधिकारियों के पक्ष में अंतिम फैसला सुना दिया है।
सरकार की प्रक्रिया में त्रुटि का उल्लेख
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में माना कि उस समय राज्य सरकार ने लोक सेवा आयोग से समय पर आवश्यक परामर्श नहीं लिया, जबकि वर्ष 2007-08 में प्रमोटी कोटे में पर्याप्त रिक्तियां उपलब्ध थीं और संबंधित अधिकारी अपने निर्धारित कोटे के अंतर्गत कार्यरत थे। न्यायालय ने कहा कि ऐसी स्थिति में अधिकारियों को नियम 24(4) के तहत निरंतर सेवा का पूरा लाभ दिया जाना चाहिए।
तीन माह में नई वरिष्ठता सूची
सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि तीन माह के भीतर संशोधित वरिष्ठता सूची जारी की जाए, ताकि पात्र अधिकारियों को नियमित नियुक्ति, वरिष्ठता और उससे जुड़े सभी सेवा लाभ समयबद्ध तरीके से उपलब्ध कराए जा सकें।
पोस्टिंग और प्रशासनिक व्यवस्था पर भी पड़ेगा असर
विशेषज्ञों का मानना है कि संशोधित वरिष्ठता सूची लागू होने के बाद राज्य सरकार की वर्तमान पोस्टिंग व्यवस्था पर भी प्रभाव पड़ सकता है। अब तक पुरानी वरिष्ठता सूची के आधार पर कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर तैनाती की जाती रही है। नई सूची लागू होने के बाद प्रमोटी पीसीएस अधिकारियों की दावेदारी मजबूत होगी और भविष्य की पदोन्नतियों तथा एड-हॉक (Ad-hoc) सेवा लाभ से जुड़े मामलों में भी बदलाव देखने को मिल सकता है। इस फैसले को उत्तराखंड की प्रशासनिक सेवा के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण वरिष्ठता संबंधी निर्णयों में से एक माना जा रहा है, जिसका असर आने वाले वर्षों तक राज्य की नौकरशाही और पदोन्नति व्यवस्था पर दिखाई देगा।
