अंकिता हत्याकांड: पुलिस ने गिनाईं जांच की उपलब्धियां, लेकिन कथित वीआईपी का सवाल फिर गरमाया

देहरादून। उत्तराखंड के बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हो गई है। एक ओर उत्तराखंड पुलिस ने मामले की जांच, आरोपपत्र और दोषियों को सजा दिलाने की कार्रवाई का विवरण सार्वजनिक किया है, वहीं दूसरी ओर अंकिता के माता-पिता कथित वीआईपी की भूमिका की जांच और सीबीआई जांच पूरी होने तक दुष्यंत कुमार गौतम की सिक्किम के राज्यपाल पद पर नियुक्ति रोकने की मांग को लेकर दिल्ली के इंडिया गेट पर धरने पर बैठ गए। 14 अक्टूबर को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने धरनास्थल पर पहुंचकर परिवार से मुलाकात की। गुरुवार, 15 अक्टूबर को तड़के दिल्ली पुलिस ने अंकिता के माता-पिता समेत कुछ प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया, जिन्हें बाद में रिहा कर दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि अंकिता को न्याय दिलाने की दिशा में दोषियों को सजा मिलने के बाद भी कथित वीआईपी से जुड़ा विवाद क्यों बना हुआ है और जांच के इस पहलू पर अंतिम निष्कर्ष कब सामने आएगा।
पुलिस मुख्यालय में एडीजी ने रखा जांच का पूरा ब्योरा
अपर पुलिस महानिदेशक (अपराध एवं कानून व्यवस्था) डॉ. वी. मुरुगेशन ने गुरुवार को पुलिस मुख्यालय, देहरादून में आयोजित प्रेस वार्ता में अंकिता भंडारी हत्याकांड की जांच और न्यायिक कार्यवाही की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सितंबर 2022 में ऋषिकेश के निकट वनंतरा रिजॉर्ट में कार्यरत अंकिता की हत्या का मामला सामने आने के बाद पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए 24 घंटे के भीतर तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया था। मामले की गंभीरता और संवेदनशीलता को देखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित किया गया। डीआईजी स्तर की महिला आईपीएस अधिकारी को एसआईटी की कमान सौंपी गई, ताकि जांच निष्पक्षता और गंभीरता के साथ आगे बढ़ाई जा सके। डॉ. मुरुगेशन के अनुसार, एसआईटी ने डिजिटल, तकनीकी, फॉरेंसिक और भौतिक साक्ष्यों को एकत्र करने के साथ आरोपियों से पूछताछ की। गवाहों के बयान और फॉरेंसिक रिपोर्ट का विश्लेषण करने के बाद 88 दिनों में जांच पूरी कर लगभग 500 पृष्ठों का आरोपपत्र न्यायालय में दाखिल किया गया।
तीनों दोषियों को आजीवन कठोर कारावास
अभियोजन पक्ष की पैरवी और जांच में जुटाए गए साक्ष्यों के आधार पर कोटद्वार स्थित अपर जिला एवं सत्र न्यायालय ने 30 मई 2025 को पुलकित आर्य, सौरभ भास्कर और अंकित गुप्ता को दोषी करार देते हुए आजीवन कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। पुलिस के अनुसार, तीनों दोषी जेल में सजा काट रहे हैं। यह फैसला अंकिता के लिए न्याय की लड़ाई में एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। हालांकि, अब कथित वीआईपी की भूमिका को लेकर उठ रहे सवालों ने इस प्रकरण को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
कथित वीआईपी को लेकर फिर उठे सवाल
अंकिता हत्याकांड के शुरुआती दिनों से ही कथित वीआईपी का मुद्दा सार्वजनिक चर्चा में रहा है। परिवार का आरोप है कि जिस वीआईपी का उल्लेख इस मामले के संदर्भ में किया जाता रहा, उसकी भूमिका की भी स्पष्ट और प्रभावी जांच होनी चाहिए। हाल के घटनाक्रम में अंकिता के माता-पिता ने भाजपा के वरिष्ठ नेता दुष्यंत कुमार गौतम का नाम कथित वीआईपी के संदर्भ में उठाया है। गौतम को 12 अक्टूबर 2026 को सिक्किम का राज्यपाल नियुक्त किए जाने के बाद परिवार ने इस नियुक्ति पर आपत्ति जताई और मांग की कि सीबीआई की जांच पूरी होने तक नियुक्ति पर रोक लगाई जाए। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि दुष्यंत कुमार गौतम के खिलाफ परिवार की ओर से लगाए गए आरोप अभी आरोप हैं, न्यायालय द्वारा सिद्ध तथ्य नहीं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, गौतम ने आरोपों से इनकार किया है और मानहानि की कानूनी कार्रवाई भी शुरू की है। ऐसे में कथित वीआईपी की पहचान और भूमिका के संबंध में अंतिम निष्कर्ष जांच तथा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।
इंडिया गेट पर माता-पिता का धरना, राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की अपील
अपनी बेटी को न्याय दिलाने की मांग लेकर अंकिता के पिता वीरेंद्र सिंह भंडारी और मां सोनी देवी 14 अक्टूबर को दिल्ली के इंडिया गेट के निकट धरने पर बैठे। परिवार ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से अपील की कि सीबीआई जांच पूरी होने तक दुष्यंत कुमार गौतम की राज्यपाल पद पर नियुक्ति को रोकने के लिए हस्तक्षेप किया जाए। धरने के दौरान राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ने अंकिता के माता-पिता से मुलाकात कर उनका पक्ष सुना और समर्थन जताया। इस घटनाक्रम के बाद मामला राजनीतिक और सार्वजनिक विमर्श में फिर प्रमुखता से उभरा। 15 अक्टूबर की सुबह दिल्ली पुलिस ने धरने के दौरान अंकिता के माता-पिता और कुछ अन्य प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया। बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, परिवार ने केंद्र सरकार को नियुक्ति पर निर्णय लेने के लिए 24 घंटे का समय देने की बात कही है और मांग पूरी न होने पर आंदोलन तेज करने की चेतावनी भी दी है।
सीबीआई जांच पर टिकी निगाहें
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 9 जनवरी 2026 को मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से कराने की सिफारिश की थी। इसके बाद सीबीआई ने मामले से संबंधित अभिलेख अपने कब्जे में लेकर जांच शुरू की। इस जांच में कथित वीआईपी से जुड़े पहलू की पड़ताल भी परिवार की प्रमुख मांगों में शामिल है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सीबीआई जांच में कथित वीआईपी से संबंधित आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों को लेकर क्या निष्कर्ष सामने आते हैं। परिवार चाहता है कि जांच पूरी होने तक किसी भी संबंधित व्यक्ति को संवैधानिक पद पर नियुक्त किए जाने के मामले में उनकी आपत्ति पर विचार किया जाए।
न्याय की लड़ाई का अगला पड़ाव
अंकिता हत्याकांड में तीन दोषियों को आजीवन कारावास की सजा मिल चुकी है, लेकिन परिवार की नजर में न्याय की प्रक्रिया तब तक अधूरी है, जब तक कथित वीआईपी से जुड़े सवालों का स्पष्ट जवाब नहीं मिल जाता। पुलिस की ओर से पूर्व जांच और न्यायिक कार्रवाई का ब्योरा सामने रखे जाने के बीच अब सीबीआई की जांच और उसके निष्कर्षों पर सबकी निगाहें टिकी हैं। यह मामला केवल एक जघन्य अपराध में दोषियों को सजा मिलने तक सीमित नहीं रह गया है। अब इसमें पीड़ित परिवार की संतुष्टि, जांच की पारदर्शिता और आरोपों पर तथ्यात्मक निष्कर्ष सामने आने की अपेक्षा भी जुड़ गई है। अंकिता के माता-पिता की मांग है कि उनकी बेटी को न्याय दिलाने की लड़ाई में कोई भी महत्वपूर्ण पहलू अनुत्तरित न रहे।
