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पौड़ी के संगीतज्ञ ने किया शास्त्रीय संगीत के एक नए साज़ का आविष्कार, भारत सरकार से मिली मान्यता

देहरादून। पौड़ी में रहने वाले और भातखण्डे संगीत महाविद्यालय में संगीत शिक्षक पण्डित मोहन सिंह रावत ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। उन्होंने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को एक नया साज़ दे दिया है। यह उनका खुद का आविष्कार है जिसका नाम है ‘क्लासिक बैंजो’। मोहन सिंह रावत के इस सृजन को भारत सरकार से भी मान्यता मिल गई है। उनके बनाए साज़ का डिजाइन भारत सरकार नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन ने रजिस्टर्ड कर लिया है। अब इस साज़ को पेटेंट कराने की प्रक्रिया चल रही है।

पत्रकार मनु पंवार ने भारत सरकार का वो पत्र साझा करते हुए बताया कि अपने पत्र में राष्ट्रीय नवप्रवर्तन प्रतिष्ठान ने मोहन सिंह रावत के इस आविष्कार के लिए शुभकामनाएं दी हैं और यह भी बताया है कि उनका यह वाद्ययंत्र भारत सरकार में रजिस्टर्ड होने से इसके सर्जक मोहन सिंह रावत को क्या-क्या अधिकार मिल गए हैं।

मोहन सिंह रावत कई बरसों से इस प्रयोग में जुटे हुए थे। भारत सरकार से मान्यता मिलने से पहले मोहन सिंह रावत को अपने इस आविष्कार को लेकर एक लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा है। कई दौर की प्रस्तुतियां हुईं. कई दौर के प्रश्नोत्तर हुए। दस्तावेजीकरण हुआ। और आखिरकार उन्हें मान्यता दे दी गई। पेटेंट की प्रक्रिया पूरी होने के बाद मोहन सिंह रावत इस साज़ की विभिन्न मंचों पर प्रस्तुति दे सकते हैं।मोहन सिंह रावत ने बैंजो नाम के एक मामूली से साज़ में अपने प्रयोगों से उसे हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का वाद्य बना दिया है। इस साज़ पर अब वह राग-रागनियां बजा रहे हैं। मनु पंवार बताते हैं कि मोहन सिंह रावत का यह सृजन उसी तरह का है जैसे बिस्मिल्लाह खां ने विवाह-शादियों में बजने वाले साज़ शहनाई को वहां से उठाकर हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में स्थापित कर दिया। जैसे पण्डित शिव कुमार शर्मा ने कश्मीर के लोक संगीत में गूंजने वाले संतूर पर अनूठे प्रयोगों से उसे हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का एक ज़रूरी साज़ बना दिया। जैसे पण्डित विश्वमोहन भट्ट ने गिटार को परिष्कृत करते हुए उसे शास्त्रीय संगीत के लायक बनाया।

मोहन सिंह रावत उत्तराखण्ड के जीनियस संगीतज्ढ माने जाते हैं। उनकी संगीत यात्रा की शुरुआत वैसे तबले से हुई। लेकिन पौड़ी जैसे छोटे से पहाड़ी नगर में रहते हुए उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के कई साज़ों पर महारत हासिल कर ली। उनका शास्त्रीय गायिकी से लेकर संतूर, सितार, सरोद,सारंगी, वायलिन, बांसुरी, गिटार जैसे साजों पर भी अच्छा-खासा दखल है।

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